डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर और इस्लाम

डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर जी का भारत की राष्ट्रीय धारा का भरपूर अभ्यास था. उनके प्रबंध का विषय ही था, ‘भारत के राष्ट्रीय लाभांश का इतिहासात्मक और विश्लेषणात्मक अध्ययन’ (The National Dividend of India – A Historical and Analytical Study). अर्थात, भारत का इतिहास, उस इतिहास की विभिन्न सामाजिक धाराएं, उनमे आयी हुई विकृतियां, मुस्लिम आक्रांता, उन आक्रान्ताओंने किया हुआ विध्वंस, इन सभी विषयों पर बाबासाहब का गहरा अध्ययन था. और इन विषयों पर उन्होंने अपनी राय हमेशा ही बेबाक ढंग से रखी हैं.

२८ दिसंबर, १९४० को उनका Thought on Pakistan यह पुस्तक प्रकाशित हुआ. उस समय तक पाकिस्तान का मुद्दा गरमाया तो था, लेकिन राष्ट्रीय बहस का विषय नहीं बना था. पुस्तक प्रकाशित होने के समय दूसरा विश्वयुध्द प्रारंभ हो चुका था. इस पृष्ठभूमि पर इस पुस्तक में बाबासाहब ने इस्लाम और पकिस्तान के बारे में किसी की परवाह न करते हुए, निर्भीकता के साथ खरी खरी सुनायी हैं. उन्होंने विभाजन का समर्थन किया हैं. इस्लाम से ‘छुटकारा’ पाने के लिए विभाजन कितना आवश्यक हैं, इस बात को बार बार दृढ़ता के साथ रखा हैं. मुसलमानों के साथ हिन्दुओं का सह अस्तित्व संभव ही नहीं हैं, इस बात को दमदारी के साथ प्रतिपादित किया हैं. और इसीलिए विभाजन के समय जनसंख्या के अदला-बदली की शर्त को वे अनिवार्य मानते हैं.

महत्वपूर्ण बात यह हैं की बाद में हिन्दू-मुस्लिम दंगे, बटवारा, आजादी, संविधान का निर्माण इस सब प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद भी इस विषय पर उनकी सोच अडिग हैं. बिलकुल भी नहीं बदली हैं. बटवारे के समय जनसंख्या की अदला-बदली नहीं हो सकी हैं. इसके बावजूद भी बाबासाहब को विभाजन यह एक अच्छी घटना लग रही हैं.

पाकिस्तान पर पुस्तक प्रकाशित होने के लगभग १५ वर्ष बाद लिखे एक लेख में बाबासाहब ने मुस्लिमों को ‘अभिशाप’ इस शब्द से संबोधित किया हैं. महाराष्ट्र शासन द्वारा प्रकाशित उनके ‘Dr. Babasaheb Ambedkar – Writing and Speeches’ इस ग्रन्थ साहित्य के पहले खंड के १४६ वे पृष्ठ पर इस सन्दर्भ में बड़ा स्पष्ट उल्लेख हैं. बाबासाहब लिखते हैं – ”When partition took place, I felt that God was willing to lift his curse and let India be one, great and prosperous” (जब विभाजन हुआ, तब मुझे ऐसा लगा, मानो ईश्वर ने इस देश को दिया हुआ ‘अभिशाप’ वापस ले लिया हैं और अब अपने देश को एक रखने का, महान और समृध्दशाली बनने का रास्ता साफ़ हो गया हैं.)

यहां पर ‘अभिशाप’ यह शब्द किस अर्थ में प्रयोग किया गया हैं, यह स्पष्ट हैं. इस्लामी आक्रान्ताओं का इतिहास बाबासाहब को अच्छे से मालूम था. हिन्दू और बौध्द धर्मीय लोगों पर मुसलमानों ने किये हुए पाशविक और बर्बरतापूर्ण अत्याचारों का उनका जबरदस्त अध्ययन था. इन अत्याचारों का वे स्पष्टता के साथ उल्लेख भी कर रहे हैं. अर्थात ‘इस्लामी जनता से अलग होकर ही भारत का विकास हो सकता हैं’, यह उनकी मजबूत धारणा हैं.

ये आगे भी दिखाई देता हैं – उनकी मृत्यु से मात्र छह माह पहले, अर्थात २३ जून, १९५६ को दिल्ली में अखिल भारतीय बौध्दजन समिति के प्रकट सभा में बाबासाहब ने अपने यही विचार स्पष्टता से रखे हैं – “I was glad that India was separated from Pakistan. I was the philosopher so to say, of Pakistan. I advocated Pakistan because I felt that it was only by partition that Hindus would not only be independent, but free.”

आंबेडकर - ३

अपने पाकिस्तान पर लिखे गए पुस्तक में ऊपर कही गयी सभी बातों का विस्तृत विवरण आता हैं. चुंकि बाबासाहब वकील थे, इसलिए उन्होंने ‘पाकिस्तान’ इस विषय के दोनों पक्षों का प्रतिपादन किया हैं.

‘मुस्लिम केस फॉर पाकिस्तान’ इस शीर्षक के अंतर्गत तीन अध्याय हैं. उनमे ‘मुस्लिम लीग की मांगे’, ‘राष्ट्र को घर चाहिए’ और ‘दुर्दशा से पलायन’ जैसे विषयों पर विस्तार से विवेचन किया हैं.

पुस्तक के अगले तीन अध्याय ‘हिन्दू केस अगेंस्ट पाकिस्तान’ इस शीर्षक के अंतर्गत हैं. ‘खंडित एकता’, सुरक्षा की दुर्बलता’ और पाकिस्तान तथा धार्मिक एकता’ इन विषयों द्वारा पाकिस्तान के निर्माण के विरोध में हिन्दू समाज के तर्कों को रखा गया हैं.

आगे ‘पाकिस्तान नहीं बना तो’ इस शीर्षक के अंतर्गत तीन अध्याय हैं. इसमें पाकिस्तान का विकल्प, हिन्दू और मुस्लिमों के दृष्टिकोण से दिया हैं.

अंतिम तीन अध्याय ‘पाकिस्तान के निर्माण की बेचैनी’ इस शीर्षक के अंतर्गत हैं. इनमे सामाजिक मुद्दे, जातिगत संघर्ष, राष्ट्रीय अवसाद आदि विषयों की चर्चा हैं. और सबसे अंत में पूरे पुस्तक का सार, संक्षेप में दिया हैं.

यह पुस्तक अनेक अर्थों में महत्वपूर्ण हैं. यह पुस्तक किसी हिन्दुत्ववादी चिन्तक ने लिखी हुई नहीं हैं. वरन बाबासाहब जैसे अत्यंत कुशाग्र बुध्दी के व्यक्ति ने, हिन्दू – मुस्लिम मसले के सभी पहलुओं पर सारगर्भित विचार कर यह पुस्तक लिखी हैं. इसलिए यह एकपक्षीय होने का प्रश्न ही नहीं उठता. बाबासाहब ने अनेकों बार हिन्दू धर्म पर प्रखर टिप्पणी की हैं. इसलिए ऐसे हिन्दू समाज के पक्षधर न रहने वाले व्यक्ति ने, संविधान के निर्माता ने यह ग्रन्थ लिखा हैं, यह महत्वपूर्ण हैं.

इस पुस्तक में बाबासाहब लिखते हैं – “ भारत में हिन्दू – मुस्लिम एकता कभी अस्तित्व में ही नहीं थी. मुसलमान शासक के रूप में भारत में आये थे, इसलिए वे इसी मानसिकता में रहते हैं. १८५७ का विद्रोह भी हिन्दू – मुस्लिम एकता का प्रतीक नहीं था, वरन मुसलमानों ने अपनी ‘छिनी गयी’ शासक की भूमिका को फिर से वापस लेने के लिए अंग्रेजों से छेड़ा विद्रोह था.”

बाबासाहब मुस्लिम धर्म के बारे में भी विस्तार से लिखते हैं, “मुसलमानों में समता नहीं हैं. इस धर्म में महिलाओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया जाता. मुसलमानों के अलावा वें सभी को काफिर मानते हैं. और ‘मुसलमानों के देश में / समाज में काफिरों के साथ दोयम दर्जे का हीन व्यवहार होना चाहिए’ यह उनके धर्म में ही लिखा हैं.” इस सन्दर्भ में बाबासाहब ने अनेक उदाहरण दिए हैं. तैमुरलंग की मिसाल देकर वे बताते हैं की उसने कैसे पाशविक अत्याचार हिन्दुओं पर किये थे.

आंबेडकर - २

तो फिर ऐसे मुसलमानों के साथ हिन्दुओं की एकता संभव हैं क्या..? अगर हैं, तो कैसे..? इस बारे में पुस्तक के अंत में बाबासाहब लिखते हैं, “हिन्दू – मुस्लिम एकता यह ‘तुष्टिकरण’ (appeasement) या ‘समझौता’ (settlement) इन दो ही रास्तों से संभव हैं. (If Hindu – Moslem unity is possible, should it be reached by appeasement or settlement..? – Chapter IV, Page 264).

इसमें उल्लेख किया गया तुष्टिकरण (appeasement) यह शब्द बाबासाहब ने मुसलमानों के सन्दर्भ में अनेकों बार प्रयोग किया हैं. ‘कांग्रेस पार्टी मुसलमानों का तुष्टिकरण करती हैं, जो देश के लिए घातक हैं’, यह कहते हुए बाबासाहब लिखते हैं – Congress has failed to realize is the fact that there is a difference between appeasement and settlement and that the difference is an essential one (Chapter IV, Page 264).

इसी अध्याय में बाबासाहब ‘तुष्टिकरण’ इस शब्द की व्याख्या करते हैं. वे लिखते हैं, “तुष्टीकरण याने आक्रान्ता का दिल जितने के लिए उसने किये हुए खून, बलात्कार, चोरी, डकैती आदि को अनदेखा करना” (Appeasement means to offer to buy off the aggressor bu convincing at or collaborating with him in the rape, murder and arson on innocent Hindus, who happen for the moment to be the victims of his displeasure).

अर्थात ‘कितना भी तुष्टिकरण किया जाय, आक्रांता का कितना भी अनुनय किया जाय, उनकी मांगों का कोई अंत नहीं होता…’

बाबासाहब ने बड़े ही आग्रह के साथ लोकसंख्या के अदला-बदली को प्रतिपादित किया हैं. ‘पूर्व और पश्चिम पाकिस्तान में सभी मुसलमान और हिंदुस्तान में सभी हिन्दू’ यह उनकी पक्की सोच हैं. और पूरी आस्था के साथ उन्होंने अपनी इस राय को बार बार दोहराया हैं.

भारत विभाजन - २

बाबासाहब की यह राय आगे भी कायम रही हैं. भारत स्वतंत्रता के दहलीज पर हैं, और ऐसे समय, २० जुलाई, १९४७ में प्रकाशित अपने वक्तव्य में बाबासाहब कहते हैं – “बंगाल और पंजाब का विभाजन यह केवल उन प्रान्तों के निवासियों का प्रश्न नहीं हैं. यह राष्ट्रीय प्रश्न हैं. इन प्रान्तों की सीमा रेषा तय करना यह सुरक्षा और व्यवस्थापन इन मुद्दों के आधार पर ही संभव हैं. जनसंख्या के अदला-बदली को यदी कांग्रेस और लीग मानती, तो यह समस्या खड़ी ही नहीं होती. (खंड १७, पृष्ठ ३५५)

बाबासाहब ने १९३६ में धर्मांतर की घोषणा की. घोषणा के पहले और बाद में उन्होंने विभिन्न धर्मोंका बारीकी से अध्ययन किया. इस दौरान हैदराबाद रियासत के नवाब ने उन्हें मुस्लिम धर्म में आने के लिए कुछ करोड़ रुपये पेश किये. (संदर्भ – धनंजय कीर द्वारा लिखित बाबासाहेब आंबेडकर चरित्र) किन्तु बाबासाहब ने यह पेशकश ठुकरा दी.

बाद में बाबासाहब का झुकाव बौध्द धर्म के पक्ष में होने पर उन्होंने ‘बौध्द और इस्लाम’ संबंधों पर विस्तार से लिखा हैं. इस्लामी आक्रान्ताओं ने कितनी बर्बरता से बौध्द भिक्खुओं को मौत के घाट उतारा, बौध्द विहारों को उध्वस्त किया, इस बारे में बाबासाहब लिखते हैं, “इस्लाम में ‘बुत शिकन’ यह सम्मान से बोला जाने वाला शब्द हैं. इसका अर्थ हैं, ‘मूर्ती फोड़ने वाला’. इसमें जो ‘बुत’ हैं, वह ‘बुध्द’ शब्द का अपभ्रंश (परिवर्तित रूप) हैं.” ‘बौध्द धर्म को समाप्त करने में मुस्लिम आक्रान्ताओं की भूमिका प्रमुख हैं’, ऐसा बाबासाहब ने अनेक स्थानों पर लिखा हैं.

इस्लाम और पाकिस्तान के बारे में बाबासाहब की सोच ऐसे सीधी, सरल और सपाट हैं. एकदम स्पष्ट. कही कोई संभ्रमावस्था नहीं हैं. जीवन के अलग अलग मुकाम पर भूमिका बदलनेका भी प्रयास नहीं हैं. ‘हिन्दू – मुस्लिम एक साथ नहीं रह सकते इसलिए विभाजन आवश्यक हैं’ ऐसा स्पष्ट प्रतिपादन.

हम बाबासाहब की विभाजन की भूमिका से सहमत होंगे या नहीं होंगे. किन्तु उनकी दूरदृष्टि और सोच की स्पष्टता देखकर मन अचंभित रह जाता हैं..!
– प्रशांत पोल

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१ ऑगस्ट, १९४७

शुक्रवार. १ ऑगस्ट, १९४७. हा दिवस अचानकच महत्वाचा होऊन गेला. या दिवशी काश्मीर च्या संदर्भात दोन गोष्टी घडल्या, ज्या पुढे खूप महत्वाच्या ठरणार होत्या. त्या दोन्ही गोष्टींचा एकमेकांशी तसा काही संबंध नव्हता. पण पुढे घडणाऱ्या रामायण-महाभारतात या दोन गोष्टींचं स्थान आवश्यक असणार होतं.

१ ऑगस्ट ला गांधीजी श्रीनगर ला पोहोचले, ही ती पहिली गोष्ट. गांधीजींचा हा पहिलाच काश्मीर दौरा. यापूर्वी सन १९१५ मध्ये, अर्थात गांधीजी नुकतेच दक्षिण अफ्रिकेतून परत आले असताना आणि पहिलं विश्व युध्द चालू असताना, काश्मीर चे महाराजा हरीसिंह यांनी गांधीजींना काश्मीर भेटीचं व्यक्तिगत निमंत्रण दिलं होतं. महाराज तेंव्हा फक्त वीस वर्षांचे होते. मात्र १९४७ मधे सारंच काही नाटकीय रित्या बदललेलं होतं. या खेपेस महाराजांना आणि जम्मू-काश्मीर प्रशासनाला गांधीजींचा दौरा नको होता. स्वतः महाराज हरीसिंहांनी या संदर्भात एक पत्र व्हाईसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन यांना लिहिलं होतं. त्यात ते म्हणाले होते, “सर्व दृष्टीने, सर्वकष विचार करता आम्हाला हेच सुचवावसं वाटतं की महात्मा गांधींनी त्यांचा नियोजित काश्मीर दौरा या वेळेस रद्द करावा. आणि त्यांना जर यायचेच असेल तर त्यांनी शरद ऋतू संपल्यावर यावं. आम्ही परत सांगू इच्छितो, गांधीजी किंवा अन्य कोणाही राजकीय पुढाऱ्याने काश्मीर मधील स्थिती सुधारल्या शिवाय येथे येऊ नये.”

म्हणजेच ‘यजमानांचा विरोध असतानाही त्यांच्या घरी जावं’ असा हा प्रसंग होता. गांधीजींना ही काही प्रमाणात याची जाणीव होती. काश्मीर हा आता भारत आणि पाकिस्तान, या दोघांच्या साठी कळीचा मुद्दा होता. स्वातंत्र्य अक्षरशः दोन आठवड्यांच्या उंबरठ्यावर येऊन ठेपलं होतं. आणि अजूनही काश्मीर ने आपला निर्णय जाहीर केलेला नव्हता.

म्हणूनच गांधीजींना काश्मीर चा हा दौरा म्हणजे ‘काश्मीर भारतीय संघराज्यात विलीन व्हावं, अश्या अर्थाने आपण कॅंपेन करतोय’ असं चित्र नको होतं. ही गोष्ट त्यांच्या व्यक्तिमत्वाला मारक ठरणारी झाली असती, असं त्यांना वाटत होतं. २९ जुलै ला, काश्मीर दौऱ्यावर निघण्यापूर्वी गांधीजींनी दिल्लीतल्या आपल्या प्रार्थना सभेत म्हटलं होतं – “मी महाराजांना भारतात शामिल व्हा आणि पाकिस्तानात होऊ नका, असं सांगायला जात नाहिये. काश्मीर चे खरे मालक म्हणजे काश्मिरातली जनता आहे. तिनेच ठरवायचे की कुठे शामिल व्हायचं ते. आणि म्हणूनच मी काश्मिरात काहीही सार्वजनिक काम करणार नाहिये. अगदी प्रार्थना सुध्दा. ती माझी वैयक्तिक असेल..!”

महाराज हरीसिंह आणि गांधीजी

गांधीजी रावळपिंडी मार्गाने काश्मीर च्या श्रीनगर मधे १ ऑगस्ट ला दाखल झाले. या वेळेस त्यांना महाराजांचे निमंत्रण नसल्याने ते ‘किशोरीलाल सेठी’ यांच्या घरी थांबले. त्यांचं हे घर भाड्याचं असलं तरी चांगलं प्रशस्त होतं. आजच्या श्रीनगर मधल्या बार्झुल्याच्या ‘बोन एंड जॉइंट हॉस्पिटल’ च्या अगदी जवळ हे घर होतं. हे सेठी साहेब जंगलांचे ठेके घ्यायचे. ते कॉंग्रेस च्या जवळचे होतेच, पण नेशनल कॉन्फ्रेंस च्या ही जवळ होते. मात्र त्यावेळी नेशनल कॉन्फ्रेंस चे नेते शेख अब्दुल्ला यांना महाराजांनी तुरुंगात डांबले होते. नेशनल कॉन्फ्रेंस च्या अनेक नेत्यांना काश्मीर बाहेर हाकलण्यात आले होते. शेख अब्दुल्लांच्या नेतृत्वाखाली हे सर्व नेते / कार्यकर्ते महाराजां विरुध्द कट करत होते, असा त्यांच्यावर आरोप होता.

आणि म्हणूनच, १ ऑगस्ट ला गांधीजी जेंव्हा रावळपिंडी च्या मार्गाने श्रीनगर ला येत होते, तेंव्हा चकलाला ला बख्शी गुलाम मोहंमद आणि ख्वाजा गुलाम मोहम्मद सादिक, या नेशनल कॉन्फ्रेंस च्या नेत्यांनी त्यांना ‘कोहला ब्रिज’ पर्यंत सोडलं आणि ते दोघंही परत लाहोर ला गेले. गांधीजींच्या बरोबर त्यांचे व्यक्तिगत सचिव प्यारेलाल आणि दोन पुतण्या होत्या. श्रीनगर मधे प्रवेश केल्यावर गांधीजी सरळ किशोरीलाल सेठी यांच्या घरी गेले. तिथे थोडा विश्राम केल्यावर त्यांना दल सरोवरावर नेण्यात आले.

गांधीजींच्या ह्या संपूर्ण दौऱ्यात नेशनल कॉन्फ्रेंस ची च माणसं त्यांच्या आजुबाजूला होती. हे असं कां..? तर काश्मीर च्या ह्या पहिल्या भेटी आधी गांधीजींनी नेहरूं कडून सर्व माहिती घेतली होती. त्यांनी स्वतःच या काश्मीर दौऱ्यात ही माहिती दिली. काश्मिरात पंडित नेहरूंचे सर्वात जवळचे मित्र होते – शेख अब्दुल्ला, जे तुरुंगात बंदिस्त होते. अर्थात तरीही शेख साहेबांच्या बेगमेनं आणि इतर अनुयायांनी गांधीजींची सर्व व्यवस्था बघितली होती.

काश्मीर मधे गांधीजींना भेट देणारी पहिली अधिकृत शासकीय व्यक्ति होती – ‘रामचंद्र काक’. महाराजा हरीसिंहांचे अत्यंत विश्वासपात्र असलेले, काश्मीर चे प्रधान. नेहरूंच्या ‘हेट लिस्ट’ मधे सर्वात वरचं स्थान असलेली व्यक्ति. कारण जेंव्हा १५ मे, १९४६ ला शेख अब्दुल्लांना, त्यांच्या काश्मीर विरोधी कारस्थानासाठी बंदिस्त करून तुरुंगात टाकण्यात आलं, तेंव्हा नेहरूंनी त्यांचं वकीलपत्र घेण्यासाठी काश्मीर ला येण्याची घोषणा केली. या काक महाशयांनी नेहरूंना काश्मिरात प्रवेश बंदी घातली आणि मुजफ्फराबाद जवळ नेहरूंना अटक केली. नेहरूंना याचा अर्थातच प्रचंड राग होता..!

या रामचंद्र काक यांनी गांधीजींना सील केलेलं महाराजांचं पत्र दिलं. हे पत्र म्हणजे गांधीजींना भेटीचं निमंत्रण होतं. तीन ऑगस्ट ला महाराजांच्या ‘हरी निवास’ ह्या निवासस्थानी ही भेट ठरली.

नेहरूंच्या ब्रीफिंग प्रमाणे गांधीजींच्या ह्या संपूर्ण काश्मीर प्रवासात त्यांच्या भोवती वेढा होता तो नेशनल कॉन्फ्रेंस च्या कार्यकर्त्यांचाच. शेख साहेबांच्या अनुपस्थितीत बेगम अकबर जहाँ आणि मुलगी खलिदा ह्या गांधीजींच्या तीन दिवसांच्या वास्तव्यात अनेकदा त्यांना भेटायला आल्या.

दिनांक १ ऑगस्ट ला श्रीनगरात गांधीजींनी एकाही राष्ट्रवादी हिंदू नेत्याची भेट घेतली नाही..!


१ ऑगस्ट ला च दुसरीही एक महत्वाची घटना घडत होती, ज्यामुळे पुढील अनेक वर्षांपर्यंत भारतीय उपखंडात असंतोष राहणार होता. आणि ही घटना देखील काश्मीर च्या संदर्भातच होती. महाराजा हरीसिहांच्या नेतृत्वाखाली असलेलं काश्मीर राज्य बरंच मोठं होतं. सन १९३५ मधे त्यातील ‘गिलगीट एजेन्सी’ हा भाग ब्रिटिशांनी काढून, ब्रिटीश साम्राज्याशी जोडला. मुळात संपूर्ण आणि अखंड काश्मीर हे या पृथ्वीवरचं अक्षरशः नंदनवन आहे. त्यातून सामरिक आणि सैनिकी दृष्टीने काश्मीर हे फार महत्वाचं राज्य होतं आणि आहे. तीन देशांच्या सीमा या राज्याला मिळत होत्या. १९३५ मध्ये दुसरं विश्व युध्द जरी लांब असलं तरी जागतिक राजकारणात मोठे फेरबदल व्हायला सुरुवात झाली होती. रशियाची शक्ती वाढत होती. आणि म्हणूनच काश्मीर चा रशियाला जोडणारा जो भाग, अर्थात ‘गिलगीट एजेन्सी’, होता तो ब्रिटिशांनी महाराजा हरीसिहांपासून काढून घेतला.

गिलगित - बाल्टिस्तान -१

पुढे झेलम मधून बरंच पाणी वाहून गेलं. दुसरं विश्व युध्द संपलं. त्या युध्दात भाग घेतलेले सारेच देश खिळखिळे झाले होते. ब्रिटिशांनी भारत सोडण्याचा निर्णय घेतला होता. या सर्व परिस्थितीत ‘गिलगीट एजेन्सी’ (अर्थात गिलगीट-बाल्टीस्तान हा प्रदेश) सारख्या दुर्गम भागावर नियंत्रण ठेवण्यात ब्रिटिशांना कसलंही स्वारस्य नव्हतं. आणि म्हणूनच, भारताला अधिकृत स्वातंत्र्य देण्याआधीच, १ ऑगस्ट ला, ब्रिटिशांनी ‘गिलगीट एजेन्सी’ हा भाग महाराजांना सोपविला. १ ऑगस्ट, १९४७ च्या सूर्योदयाला गिलगीट-बाल्टीस्तान मधील सर्व जिल्हा मुख्यालयात यूनियन जेक च्या जागी काश्मीर चा राजध्वज मोठ्या दिमाखात फडकत होता.

मात्र या हस्तांतरणाला महाराज कितीसे तयार होते..? फारसे नाही..!
या भागाच्या रक्षणासाठी ब्रिटिशांनी ‘गिलगीट स्काउट’ ही बटालियन तैनात केली होती. काही ब्रिटीश अधिकारी सोडले तर अख्खी फौज मुसलमान होती. १ ऑगस्ट च्या हस्तांतरणाबरोबर ही मुस्लिमांची फौज सुध्दा महाराजांजवळ आली. महाराजांनी या प्रदेशाचा गव्हर्नर म्हणून ब्रिगेडियर घन्सारा सिंह यांची नेमणूक केली. मात्र त्यांच्या सोबत ‘गिलगीट स्काउट’ चे मेजर डब्लू. ए. ब्राऊन आणि कॅप्टन ए. एस. मेथिसन हे अधिकारी दिले. ‘गिलगीट स्काउट’ चा सुभेदार मेजर बाबर खान देखील या लोकांबरोबर होता.

गिलगित - बाल्टिस्तान - २

हे करताना महाराजांना असं मुळीच वाटलं नसेल की फक्त दोन महिने तीन दिवसांनी पूर्ण ‘गिलगीट स्काउट’ गद्दारी करेल आणि गव्हर्नर ब्रिगेडियर घन्सारा सिंह यांनाच बंदी बनवेल…!

१ ऑगस्ट च्या ह्या गिलगीट च्या हस्तांतरणाने भविष्यातील महत्वाच्या घटनांची नांदी लिहून ठेवली..!


अखंड हिंदुस्थानाचं खंडित स्वातंत्र्य उंबरठ्यावर येऊन ठेपलेलं असताना देशाच्या पूर्व आणि पश्चिम सीमेवर प्रचंड नरसंहार चालला होता. स्वातंत्र्याचा आणि अर्थातच विभाजनाचा दिवस जसा जसा जवळ येत जाईल, तसा तसा हा नरसंहार वाढत जाईल असा ब्रिटीश अधिकाऱ्यांचा होरा होता. म्हणूनच त्यांनी, ह्या दंगलीची आग कमी करण्यासाठी हिंदू, मुस्लिम आणि शीख अश्या मिश्र सेनेची कल्पना मांडली. त्यानुसार ‘पंजाब बाउन्ड्री फोर्स’ ही सेना निर्माण करण्यात आली. यात अकरा मिश्रित इन्फंट्री होत्या. एकूण सैनिक होते पन्नास हजार आणि नेतृत्व करणारे चार ब्रिगेडियर होते – मोहम्मद अयूब खान, नासीर अहमद, दिगंबर ब्रार आणि थिमय्या.

१ ऑगस्ट ला ह्या चौघाही ब्रिगेडियर्स नि लाहोर ला त्यांच्या तात्पुरत्या मुख्यालयात ‘पंजाब बाउन्ड्री फोर्स’ च्या कामाला सुरुवात केली.

मात्र फक्त पंधराच दिवसांनी, ह्या मिश्रित सेनेला त्यांचं मुख्यालय, लाहोर, जळताना बघावं लागणार होतं..!


याच वेळी दूर कलकत्त्यात एक नाट्य रंगात आलेलं होतं….

कॉंग्रेस चे वरिष्ठ नेते आणि नेताजी सुभाष चंद्र बोस यांचे मोठे भाऊ शरद चंद्र बोस यांनी १ ऑगस्ट ला कॉंग्रेस पक्षाचा राजीनामा दिला. शरद बाबू हे तसं ज्वलजहाल व्यक्तिमत्व. चाळीस वर्ष कॉंग्रेस मध्ये राहून प्रामाणिकपणाने आणि प्राणपणाने लढलेला हा माणूस. १९३० च्या ब्रिटीश इंटलीजेंस च्या रिपोर्ट मध्ये उल्लेख आहे – “He is a man, who assisted the revolutionary movement for years by means of his Purse, his Press and his Prestige, and who was unquestionably a most dengerous opponent of Government.”

शरद चंद्र बोस आणि पंडित जवाहरलाल नेहरू यांच्यात तसं बरंच साम्य. दोघांचाही जन्म १८८९ चा. दोघांचंही शिक्षण इंग्लंड मध्ये झालं. दोघांनीही कायद्याची पदवी इंग्लंड मधूनच घेतली. तरुण पणात दोघांचेही विचार डाव्या विचारधारेकडे झुकणारे होते. पुढे दोघेही कॉंग्रेस मध्ये सक्रीय झाले. दोघांचेही आपसातील संबंध चांगले होते.

शरत चन्द्र बोस

मात्र १९३७ च्या बंगाल च्या प्रांतिक निवडणुकीत कॉंग्रेस ला सर्वाधिक ५४ जागा मिळाल्या. त्या खालोखाल ‘कृषक प्रजा पार्टी’ आणि ‘मुस्लिम लीग’ ला प्रत्येकी ३७ जागा मिळाल्या. बंगाल कॉंग्रेस चे नेते या अधिकाराने शरद चंद्र बोस यांनी कॉंग्रेस ला आणि प्रामुख्याने गांधी – नेहरूंना गळ घातली की कॉंग्रेस आणि कृषक प्रजा पार्टी यांनी मिळून संयुक्त सरकार स्थापन केले पाहिजे. मात्र कॉंग्रेस ने हे ऐकले नाही. सर्वाधिक जागा मिळूनही कॉंग्रेस पक्ष विरोधी बाकांवर बसला आणि मुस्लिम लीग ने कृषक प्रजा पार्टी च्या मदतीने सरकार स्थापन केले. शेर-ए-बंगाल, ए. के. फजलुल हक हे बंगाल चे ‘प्रधानमंत्री’ झाले. तेंव्हापासून बंगाल मधे कॉंग्रेस चा पाया कमकुवत झाला. त्याची परिणीती पुढे ९ वर्षांनी सुऱ्हावर्दी सारख्या मुस्लिम लीग च्या ‘पंतप्रधाना’ मध्ये झाली, ज्याच्या नेतृत्वात १९४६ मध्ये ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ च्या दिवशी पाच हजार निर्दोष हिंदूंची अमानुष कत्तल झाली…!

ह्या सर्व घटना शरद बाबूंना व्यथित करत होत्या. ते वेळोवेळी या संबंधात कॉंग्रेस नेतृत्वाला, आणि विशेषतः नेहरूंना लिहित होते. मात्र त्याचा काहीही उपयोग होत नव्हता. १९३९ च्या त्रिपुरी (जबलपुर) कॉंग्रेस च्या अध्यक्षपदाच्या निवडणुकीत नेहरूंनी सुभाषबाबूंच्या विरोधात जी प्रचाराची राळ उठवली होती, त्यामुळेही शरद बाबूंचे चिडणे स्वाभाविकच होते.

आणि या सर्वांवर कुरघोडी म्हणजे गांधी – नेहरूंनी बंगाल च्या विभाजनाला दिलेली मान्यता. शरद बाबूंना हे पटणारं नव्हतं. आणि म्हणूनच १ ऑगस्ट ला त्यांनी आपल्या चाळीस वर्ष जुन्या, कॉंग्रेस पक्षाला सोडचिठ्ठी दिली..!

१ ऑगस्ट ला च शरद बाबूंनी ‘सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ ह्या पक्षाची स्थापना केली. ‘देशाची फाळणी आणि देशात निर्माण झालेलं अराजकतेचं वातावरण हे नेहरूंच्या नेतृत्वाचे अपयश आहे’ असं त्यांनी जोरकस पणे मांडलं.


१ ऑगस्ट. देशात घडणाऱ्या प्रचंड आणि वेगवान घडामोडींचा दिवस आता मावळायला आला होता. पंजाब मात्र पेटलेलाच होता. रात्रीच्या त्या भयाण काळोखात पंजाब, सिंध, बलोचीस्तान इथल्या अनेक गावांमधून जळणाऱ्या घरांच्या भेसूर अग्निज्वाला दूर दूरवर दिसत होत्या. संघाचे अठ्ठावन हजार स्वयंसेवक संपूर्ण पंजाबात हिंदू – शिखांचं रक्षण करण्यासाठी दिवसरात्र एक करत होते. बंगाल मधे परिस्थिती अराजकतेच्या दिशेने वाटचाल करत होती….

स्वातंत्र्य आणि त्याबरोबरचे विभाजन आता फक्त चौदा दिवस दूर होते…!
– प्रशांत पोळ

फक्त एका पुस्तकाने इतका गदारोळ..?

डॉ. अभिराम दीक्षित हे नाव तसं
सोशल मिडिया मध्ये चर्चित नाव.
सावरकर आणि शेषराव मोरे गटातलं हे नाव..!
प्रचंड वाचन, फटकेबाज लेखणी, टोकाचा उपरोध,
सोशल मिडिया मधे कायम वास्तव्य
आणि जोडीला स्वतः बद्दल प्रचंड अभिमान..!
आता इतकं सारं असलं
की सोशल मिडिया वर ‘चर्चित व्यक्तित्व’ असणारच.
प्रचंड लाईक्स मिळणारच..!
तर अश्या ह्या डॉक्टर अभिराम दिक्षितांचा
माझ्या ‘भारतीय ज्ञानाचा खजिना’
ह्या पुस्तकाला वाचून प्रचंड तिळपापड झालेला आहे.

कव्हर - भारतीय ज्ञानाचा खजिना
ह्या पुस्तकाला प. पू. सरसंघचालक
डॉ. मोहनराव भागवतांची प्रस्तावना आहे.
याचं विमोचन महाराष्ट्राचे लाडके मुख्यमंत्री
मान. देवेंद्र फडणवीस यांनी केलंय.
या सर्वांचा डॉक्टर दीक्षितांना किती राग यावा..?
तर त्यांनी ‘संघी’ लोकांना
‘जोकर्स’, ‘ब्लडी जोकर्स’ सारख्या
इंग्रजी शिव्या दिल्या आहेत.
‘संघी’ लोकांचं विज्ञान हे ‘चंपक, ठकठक, मोगली, ब्याटमन’
च्याच धर्तीचं आहे, असा त्यांचा ठाम समज आहे.
‘संघी वेग्रे लोक्स आता विज्ञान शिकवणार आहेत – ते एक बरे आहे.
गायीचे मूत हे आता विज्ञान’ ही त्यांची
फेसबुक पोस्ट आहे.
त्यांची आणखी एक पोस्ट अशी आहे –
‘भारतीय जनता पक्षाचे मुख्यमंत्री – सरसंघचालक यांनी
‘भारतीय ज्ञानाचा खजिना’ नामक पुस्तक प्रसिद्ध केले आहे’
मी यापूर्वी अभिराम दीक्षितांना
चांगला वाचक समजत होतो. पण आता नाही.
सरसंघचालकांनी पुस्तक प्रसिद्ध केले नाही.
त्यांची ह्या पुस्तकाला प्रस्तावना आहे.
मुख्यमंत्र्‍यांनीही पुस्तक प्रसिध्द केलेले नाही.
त्यांनी विमोचन केले आहे.
ह्या पुस्तकात एकाही ठिकाणी
‘गोमुत्राचा’ उल्लेख नाही.
दीक्षितांनी सनसनाटी निर्माण करण्यासाठी
‘गायीचे मूत’ सारखे शब्द वापरले आहेत,
हे सर्व सुजाण वाचकांचे दुर्दैव..!
त्यांच्या पोस्ट्स वाचून,
त्यांचा आक्षेप कशावर आहे,
हे मला कळलेले नाही.
‘भारतीय ज्ञानाचा खजिना’ हे पुस्तक आपल्या
पुरातन, सनातन आणि चिरंतन
ज्ञानाची ओळख करून देतं,
जे ज्ञान आजही कोड्यात पाडणारं आहे.
या संबंधी काही लिहिण्या ऐवजी
डॉ. दीक्षितांनी शिवराळ भाषा वापरून
‘संघी’ लोकांचा जो ‘उध्दार’ केलेला आहे,
तो सनसनाटी निर्माण करण्यापेक्षा
वेगळा वाटत नाही..!
– प्रशांत पोळ

…आणि वैष्णवांच्या भूमीत फुलले कमळ!

देशाच्या राजकारणाला वळण देऊ शकणाऱ्या पाच राज्यांच्या निवडणुका जेंव्हा जाहीर झाल्या, तेंव्हा त्यातील दोन राज्य अगदी लहान होती – गोवा आणि मणिपुर. एक देशाच्या दक्षिण-पूर्वेत तर दुसरे उत्तर-पूर्वेच्या टोकाला. अगदी ‘डायगोनली अपोझिट’. दोन्ही प्रांतात ख्रिश्चन मतदारांचा आणि चर्च चा प्रभाव हा समान दुवा.

आणि ह्या दोन्ही राज्यात दुसऱ्या क्रमांकावर असलेल्या भाजप ने सत्ता पटकाविली आहे. ‘खाये गोरी का यार, बलम तरसे…!’ म्हणत सोशल मिडिया वर या दोन्ही राज्यांचे यथार्थ वर्णन केले जात आहे..!

मणिपुर निवडणुका - ३

या दोन्ही राज्यात क्रमांक एक चा पक्ष कॉंग्रेस होता. दोन्ही कडे त्याला फक्त ३ – ४ आमदारांची गरज होती. आणि दोन्ही राज्यात मागून येऊन, तत्परता आणि चपळता दाखवत भाजप ने सत्ता आपल्या हातात घेतली.

या दोन्ही राज्यांपैकी मणिपुर मधे भाजप चं सत्तेवर येणं फार महत्वाचं होतं. मणिपुर हे भारताच्या अगदी उत्तर-पूर्वेच्या टोकाचं राज्य. याची पूर्व सीमा, मियांमार (ब्रम्हदेश) ला लागुन असलेलं राज्य. अस्वस्थ आणि अशांत राज्य. अवघ्या २८ लाख लोकसंख्या असलेलं हे राज्य, देशाच्या सुरक्षिततेच्या दृष्टीने महत्वाचं आहे.

या राज्यात भाजप चं अस्तित्व अक्षरशः नगण्य होतं. मुळात ख्रिश्चन प्रभाव असलेलं हे राज्य अजूनही आपली प्राचीन ‘वैष्णव परंपरा’ सांभाळून आहे. मात्र दहशतवादाने ह्या राज्याला फार त्रास दिलाय. मियांमार ची सीमा लागून असल्याने, दहशतवादी आणि फुटीरतावादी, एखादे मोठे हत्याकांड करून, मियांमार मधे लपतात. आणि म्हणुनच सन २०१५ मधे आपल्या सैन्याने मणिपुर-नागालेंड ला चिटकलेल्या मियांमार च्या हद्दीत शिरून सुमारे तीस दहशतवाद्यांना मारून त्यांचे अड्डे ध्वस्त केले. कदाचित भाजपाच्या यशाचा पाया याच घटनेत दडला असावा..!

मणिपुर निवडणुका - ४

भाजपाच्या दृष्टीने मणिपुर चं महत्त्व हे देशाच्या सीमेवरील राष्ट्र म्हणून जास्त आहे. सुरक्षिततेच्या दृष्टीने इतर देशांशी सीमा लागून असलेल्या राज्यांमध्ये राष्ट्रवादी विचारधारेचं सरकार असणे आवश्यक आहे. म्हणूनच भाजप ने जम्मू-काश्मीर मधे तडजोडी करत पी डी पी बरोबर संयुक्त सरकार स्थापन केले. आणि म्हणूनच पंजाब हातचे गेल्यावर, मणिपुर मधे सरकार येणे आवश्यक होते. या कारणासाठीच ६० पैकी फक्त एक तृतियांश (२१) आमदार असूनही भाजप ने मणिपुर मधे आपला मुख्यमंत्री बसवला.

सन २०१२ च्या निवडणुकांत भाजप ला मिळालेल्या मतांची टक्केवारी होती, फक्त २.१२% आणि या निवडणुकीत मिळालेली मतं आहेत – ३६.६%. म्हणजेच भाजप च्या मतांमध्ये सणसणीत अठरा पटीची वाढ…!

कॉंग्रेस च्या मतांमध्ये काहीशी घसरण झाली. मागच्या वेळी मिळालेल्या ४२.४% मतांच्या तुलनेत त्यांना ३५.१% मतं मिळाली. अर्थात भाजप पेक्षा दीड टक्का कमीच. मात्र मिळालेल्या जागा ह्या भाजप पेक्षा सात ने जास्त होत्या. यंदा अप्रत्याशित रित्या रामविलास पासवान यांच्या पक्षाला ही एक जागा मिळाली.

मात्र सर्वांचे लक्ष असलेल्या थाऊबल ह्या विधानसभा क्षेत्रात निवडणुक निकाल अगदीच अळणी निघाले. या आधी तीनदा निवडणूक जिंकलेल्या, मुख्यमंत्री इबोबी सिंह यांच्या विरोधात, इरोम शर्मिला’ ह्या निवडणूक लढवत होत्या. मणिपुर मधून AFSPA हा दहशतवाद विरोधी कायदा दूर करावा म्हणून त्या १५ वर्ष उपोषण करत होत्या. गंमत म्हणजे त्यांना पंधराशे मतं ही मिळाली नाहीत. इबोबी सिंह यांना १५,००० तर शर्मिला इरोम यांना फक्त १०० मतांवर समाधान मानावे लागले. भाजप चे प्रदेश अध्यक्ष चाओबा सिंह हे मुख्यमंत्री पदाचे ही दावेदार होते. मात्र नाम्बोल विधानसभा क्षेत्रातून त्यांना हार मानावी लागली.

निवडणुकीचे निकाल लागल्यावर कॉंग्रेस कडे २८ आमदार असल्यामुळे, त्यांचेच सरकार बनेल असे चित्र होते. कॉंग्रेस ला फक्त तीन आमदारांचीच गरज होती, तर भाजप हा हवे होते १० आमदार..!

मणिपुर निवडणुका - २

मात्र ससा – कासवाच्या शर्यती सारखं, भाजप ने चपळता दाखविली. चार आमदार असलेल्या ‘नागा पीपल्स फ्रंट’ आणि चार आमदार असलेल्या ‘नेशनल पीपल्स फ्रंट’ ला आपल्या बाजूला वळवले. हे घसघशीत आठ आमदार भाजप च्या बाजूला आल्यावर इतर दोन आमदार सहज रित्या येऊन मिळणार हे निश्चित होतं. गोवा आणि मणिपुर मधे कॉंग्रेस ने सरकार स्थापनेसाठी जो काही वेळ लावला त्यावरून हे स्पष्ट होतं की कॉंग्रेस मधील जीवनेच्छाच संपून गेलेली आहे. निवडणुकीच्या काळातही कॉंग्रेस चे पर्यवेक्षक होते, कॉंग्रेस च्या आपल्संख्यांक मोर्च्याचे प्रमुख, करिम लश्कर, ज्यांना कॉंग्रेस चे कार्यकर्ते तरी ओळखत असतील की नाही ही शंका आहे.

आणि म्हणूनच भाजप चे केंद्रीय मंत्री पियुष गोयल आणि प्रकाश जावडेकर जेंव्हा इंफाळ मधे सरकार स्थापन करण्यासाठी जोमानं गाठी-भेटी घेत होते, तेंव्हा कॉंग्रेस चे केंद्रीय नेतृत्व काहीही हालचाल न करता आराम करत होते.

एन बिरेन सिंह हे भाजप चे मणिपुर चे पहिले मुख्यमंत्री आहेत. त्यांनी तृणमूल कॉंग्रेस च्या पांगीजम सरतचन्द्र सिंह यांना पराभूत केले. कधी फुटबाल चे चांगले खेळाडू असलेले बिरेन सिंह हे पूर्वी कॉंग्रेस चे मुख्यमंत्री इबोबी सिंह चे उजवे हात समजले जायचे. कॉंग्रेस च्या नेतृत्वाशी मतभेद झाल्यामुळे गेल्या वर्षी त्यांनी कॉंग्रेस सोडून भाजप मधे प्रवेश केला होता.

पूर्वांचलातील मणिपुर हे भाजपा शासित तिसरे राज्य झाले आहे. अरुणाचल प्रदेश, आसाम आणि आता मणिपुर. गेली अनेक वर्षे आपले पूर्वांचल, अस्वस्थ राहिलेले आहे. देशाचा हा समृध्द आणि संपन्न भाग दहशतवादामुळे उपेक्षित राहिलेला होता. नागलंड, मणिपुर आणि मिझोरम या, मियांमार च्या सीमेला लागून असलेल्या राज्यांमध्ये तर फुटीरतावादी शक्तींनी थैमान घातले होते. आता मणिपुर मधे भाजप च्या रुपात राष्ट्रवादी विचारांचे सरकार आल्यामुळे सीमेवर एक जागता प्रहरी तैनात झाला आहे..!
– प्रशांत पोळ