‘रामलीला’

मंच पर दशरथ विलाप का दृश्य चल रहा हैं. प्रभु श्रीराम के वियोग में दशरथ अपने आप को कोस रहे हैं. लंबे, चौड़े संवाद हैं, सामान्य परिस्थिति में कुछ उबाऊ से लगने वाले. लेकिन मंच के दोनों ओर, हजारों दर्शक, एकचित्त / एकाग्र होकर इस दृश्य को देख रहे हैं. संवादों के बीच – बीच में कथावाचक, व्यास सूत्रधार, रामायण की चौपाईयां गा रहे हैं और हजारों दर्शक, कथावाचकों के साथ उन चौपाइयों को बोल रहे हैं…!

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आज, सन दो हजार सोलह में, सॅटॅलाइट टी व्ही की असंख्य चैनलों के बीच, गतिशील जीवनशैली में, जबलपुर जैसे महानगर में भी यह दृश्य देखने मिल रहा हैं. यह इस बात का प्रमाण हैं की प्रभु श्रीराम, इस देश के सर्वसामान्य नागरिकों के मन मष्तिष्क में आज भी ससम्मान विराजित हैं.

नवरात्रि के दिनों में देश /विदेश में रामलीला का यह खेला, खेला जाता हैं. कही दस, कही पंद्रह तो कही बीस – बाईस दिन यह लीला चलती हैं. यह नाटक नहीं हैं, वरन उससे भी बढ़कर बहुत कुछ हैं.

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इस लीला के पात्र निश्चित हैं. उनके संवाद निश्चित हैं. लीला का कथानक भी निश्चित हैं. सभी दर्शकों को यह कथानक न केवल मालूम हैं, बल्कि यह रटा हैं. इसमें कोई उत्कंठा या रहस्य छिपा नहीं हैं. अनेक दर्शकों को बीच – बीच में बोली जाने वाली तुलसी रामायण की चौपाइयां भी कंठस्थ हैं. किन्तु फिर भी रामलीला का जबरदस्त आकर्षण हैं. इस मिट्टी से कटे हुए बुध्दिजीवियों के लिए, इसका कारण समझ के परे हैं !

रामलीला की यह परंपरा कहाँ से निर्माण हुई, इसके बारे में निश्चित जानकारी नहीं मिलती. किन्तु फिर भी इतिहासविदोंका यह मानना हैं की संत तुलसीदास जी के रहते, काशी नरेश के आश्रय में रामलीला का पहली बार मंचन हुआ. सन १६१८ – १९ के लगभग गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस को पूर्ण किया और सन १६२१ में सर्वप्रथम, काशी के अस्सी घाट पर संत तुलसीदास और काशी नरेश की उपस्थिति में रामलीला का मंचन हुआ. इसे यदी हम प्रमाण मानते हैं (और जिसे मानने के लिए हमारे पास अनेक तथ्य उपलब्ध हैं), तो अगले पाँच वर्षों बाद रामलीला को चार सौ वर्ष पूर्ण होंगे.

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संत तुलसीदास जी की स्मृति में काशी नरेश ने रामनगर की रामलीला को विश्वप्रसिध्द बना दिया. इस रामलीला में जो मुकुट, धनुष-बाण, खडाऊं और कमंडल का प्रयोग होता हैं, वें प्रभु रामचन्द्रजी द्वारा प्रयोग किये गए हैं, ऐसा माना जाता हैं. ये सारे दिव्य उपस्कर, काशी नरेश के संरक्षण में, प्राचीन बृहस्पती मंदिर में सुरक्षित हैं. वर्ष में एक बार केवल भरत मिलाप के दिन, रामनगर की इस रामलीला में ये उपस्कर निकाले जाते हैं, जिन्हें देखने हजारों की संख्या में दर्शक पहुचते हैं.

मूलतः रामलीला का मंचन २२ दिन होता हैं. लेकिन स्थानिक सुविधानुसार यह अवधि १२ से २२ दिन की हो सकती हैं. मंचन के इन दिनों में अत्यंत पवित्रता रखी जाती हैं. अनेक रामलीला समितियों में मंचन करने वाले पात्रों को इस पूरी कालावधी में अलग से रखा जाता हैं. वहां वे सारे पात्र व्रत रखते हैं, और अपने संवाद कंठस्थ करने का प्रयत्न करते रहते हैं. अत्यंत शालीन, सात्विक और पवित्र वातावरण में रामलीला का मंचन किया जाता हैं.

इन सभी पात्रों को अपने संवाद मुखाग्र होते हैं. अधिकांश पात्रों को तो तुलसी रामायण की सारी चौपाइयां मुखोद्गत रहती हैं. यदी दुर्घटनावश कोई पात्र अपने संवाद भूलता हैं, तो मंच पर उपस्थित अन्य पात्र उसे उसके संवाद का स्मरण दिलाते हैं. लेकिन रामलीला में ‘प्रोम्टिंग’ निषिध्द हैं.

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आज भी परंपरागत रामलीला में स्त्री पात्र का अभिनय पुरुष पात्र ही करते हैं. किशोर या तरुण पात्रों को यह भूमिका दी जाती हैं. वे भी उसे बखूबी निभाते हैं, तथा दर्शकों को भी उसकी आदत रहती हैं.

रामलीला का मंचन तब से होता आया हैं, जब से बिजली और माइक्रोफोन की व्यवस्था नहीं थी. तब मशाल और भभकों के उजाले में रामलीला के पात्र अपना अभिनय करते थे. आजू – बाजू कोलाहल न होने के कारण, पूर्ण शांत वातावरण में, उन दिनों रामलीला के पात्र ऊँची आवाज में बोलते थे, तो हजारों दर्शकों को सारे संवाद स्पष्ट सुनाई देते थे.

ऐसा बताते हैं की जबलपुर की प्रख्यात एवं ऐतिहासिक गोविन्दगंज रामलीला में सन १९३२ में पहली बार बिजली का प्रयोग किया गया. तब उसे देखने, केवल जबलपुर ही नहीं, तो आजू-बाजू के गाँवों से हजारों की संख्या में दर्शक आये थे.

दूरदर्शन और मोबाइल की क्रांति होने तक लोगों के मनोरंजन के साधन अत्यंत सिमित थे. अतः रामलीला को देखने के लिए दर्शकों की भीड़ स्वाभाविक रूप से टूट पड़ती थी. किन्तु नब्बे के दशक में सूचना क्रान्ति का आगाज हुआ. अनेक टी वी चैनल्स दिन-रात मनोरंजन परोसने लगे. मनोरंजन के अनेक साधन, विकल्प के रूप में सामने आए. यह दौर अधिकतर रामलीला समितियों के लिए कठीन था. दर्शकों की संख्या घट रही थी. आर्थिक सहयोग भी कम हो रहा था.

ऐसे समय में रामलीला समितियों ने अनेक प्रयोग किये. नए तकनिकी का इस्तेमाल किया. रामलीला की आत्मा वही थी, बस कलेवर थोडा बदलने का प्रयास किया. जैसे – जबलपुर की गोविन्दगंज रामलीला ने शहर के बीच में स्थित हनुमानताल में ‘लंका दहन’ का दृश्य मंचीत करना प्रारंभ किया. इसका अत्यंत सकारात्मक परिणाम हुआ. हजारों की संख्या में दर्शक पुनः रामलीला की ओर लौटने लगे.

आज का चित्र अत्यंत आशादायी हैं. इस भागदौड़ की गतिशील जीवन पध्दति में भी देश की हजारों रामलीला समितियां, वही परंपरागत तुलसी रामायण पर आधारित रामलीला का मंचन कर रही हैं और देश के लाखों – करोडो दर्शक, बड़ी एकाग्रता से और भक्तिभाव से इस रामलीला का आनंद ले रहे हैं…!
– प्रशांत पोल

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Author: प्रशांत पोळ

I am an Engineer by profession. Consultant in Telecom and IT. Interested in Indology, Arts, Literature, Politics and many more. Nationalistic views. Hindutva is my core ideology.

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