‘देश में जनसंख्या नीति एक जैसी रहे…! –

विषय अत्यंत स्पष्ट हैं. इसमें किंचित भी वैचारिक, बौध्दिक या मानसिक संभ्रम नहीं हैं..!

आगरा में एक कार्यक्रम में कल कुछ नए स्वयंसेवकों के बीच रा. स्वं. संघ के सरसंघचालक प. पू. मोहन भागवत जी का कार्यक्रम था. प्रारंभ में प्रश्नोत्तर थे. एक स्वयंसेवक, डॉ. अशोक कुमार अग्रवाल ने प्रश्न पूछा, “हमारे देश में हिन्दुओं की जन्म दर २.१% हैं, जब की मुस्लिम समाज की जन्म दर ५.२% हैं. अगर इसी तरह से हिन्दुओं की दर पीछे रही, मुसलमानों की दर ढाई गुनी आगे बढती रही, तो अगले पचास साल के बाद कैसे हम हिन्दू राष्ट्र के रूप में इस देश में रह सकेंगे..? क्या यह देश इस्लामिक कंट्री नहीं बन जाएगा..?

सरसंघचालक जी का उत्तर था, “आपको कौनसा नियम रोकता हैं..?” आगे उन्होंने कहा, “हमारे संसाधनों को देखते हुए, लोकसंख्या पर हमारे देश की नीति समान रहनी चाहिए.”

मोहन भागवत जी - १

संघ द्वारा पारित २०१५ के प्रस्ताव में भी यह स्पष्ट हैं – ‘देश की लोकसंख्या नीति सबके लिए समान होनी चाहिए.’ सरसंघचालक जी का विजयादशमी का भाषण ‘नीतिगत’ होता हैं. उसमे भी यही कहा गया था.

संघ के प्रस्ताव के अंत में कहा गया हैं –
The Akhil Bharatiya Karyakari Mandal expresses deep concern over all these severe demographic imbalances and urges the Government to –

• Reformulate the National Population Policy keeping in view availability of resources in the country, future needs and the problem of demographic imbalance and apply the same uniformly to all.

• Totally curb the illegal infiltration from across the border. Prepare a National Register of Citizens and prevent these infiltrators from acquiring citizenship rights and purchasing lands.

The ABKM calls upon the countrymen including all the Swayamsevaks to take the cognizance of the causes of these population changes and consider it their national duty to create public awareness and take all lawful steps to save the country from this demographic imbalance.

संघ Demographica Imbalance (जनसंख्या असंतुलन) को लेकर चिंतित हैं, और चिंतित रहेगा. जनसंख्या में असंतुलन यह देश में अलगाववाद पैदा करता हैं. हम सबने यह अनुभव भी किया हैं. पूरे देश में अलगाववादी गतिविधियाँ केवल वही चल रही हैं, जहां हिन्दू की संख्या कम हुई हैं.

जिस भूभाग से हिन्दू घटा, वहां पर देश तोड़ने के नारे लगे, यह हम पिछले साठ-सत्तर सालों से देख रहे हैं. संघ के सरसंघचालक इस विषय पर हमेशा चेताते रहे हैं. इसलिए, ‘अधिक बच्चे पैदा करो’ यह सन्देश नहीं हैं, और न ही ऐसा कहा गया हैं.

विषय हैं – ‘बढती जनसंख्या में असंतुलन क्यों..? और देश में एक जैसी जनसंख्या नीति क्यों नहीं..?’ मीडिया में चर्चा इस विषय पर होनी चाहिए.
– प्रशांत पोल

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Author: प्रशांत पोळ

I am an Engineer by profession. Consultant in Telecom and IT. Interested in Indology, Arts, Literature, Politics and many more. Nationalistic views. Hindutva is my core ideology.

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