भारतीय उद्योग – बुलंदियों को छूने तैयार..!

आज पूरी दुनिया जब मंदी की चपेट में हैं, तब हमारी अर्थव्यवस्था, भले ही दौड़ ना रही हो, लेकिन तेज गति से चल रही हैं. पिछले दो वर्षों से हमारे देश का नेतृत्व आर्थिक महाशक्ति बनने की बात कह रहा हैं. अमरीका, चीन, जर्मनी और जापान जैसी आर्थिक महाशक्तियों से टक्कर लेने की बात कह रहा हैं. और कुछ लजाते, सकुचाते, शर्माते, हमारा उद्योग जगत भी मानने लगा हैं की शायद हम विश्व की आर्थिक महाशक्तियों में शामिल हो सकते हैं. ऐसा आत्मविश्वास, धीरे – धीरे क्यूँ न हों, पर हमारे उद्योगपतियों में आ रहा हैं !

लेकिन क्या हम जानते हैं, की किसी जमाने में हम आर्थिक महाशक्ति थे..?

और सिर्फ आर्थिक महाशक्ति ही क्यूँ ? तब तो हम दुनिया की पहले नंबर की अर्थव्यवस्था थे !

अंग्रेजों का राज आने के समय तक, हम थोड़े पिछड़े जरुर थे, लेकिन फिर भी दुनिया की पहली तीन आर्थिक ताकतों में से एक माने जाते थे. और ये हम नहीं कह रहे हैं. कोई भारतीय अर्थशास्त्री भी यह नहीं कह रहा हैं. कहने वाले हैं, प्रोफे. अंगस मेडिसन. मूलतः ब्रिटिश, प्रोफे. अंगस, हॉलैंड के ग्रोनिंगेन विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक रहे. सन २०१० में फ़्रांस में ८३ वर्ष की आयु में उनका देहावसान हुआ. उनकी पुस्तक – ‘द वर्ल्ड इकॉनोमी – ए मिलेनियम पर्सपेक्टिव’ यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के बारे में प्रमाण मानी जाती हैं. ऐसे विश्व प्रसिध्द अर्थशास्त्री ने यह प्रतिपादन किया हैं की भारत में औरंगजेब की सत्ता आने तक भारत दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत था.

ईसा से अगले एक हजार वर्षों तक भारत की अर्थव्यवस्था अपने चरम पर थी. मुस्लिम आक्रमण नहीं हुआ था. पूरे देश में, सभी जानपदों में खुशहाली थी, समृध्दी थी, शांति थी. उद्योग व्यवसाय फल-फूल रहे थे. भारत के जहाज पूर्व और पश्चिम में सुदूर तक जाते थे. दक्षिण-पूर्व एशिया तो भारतीय रंग में रच – बस गया था. उधर पश्चिम में अरबस्तान से यूरोप और दक्षिण अमरीका तक भारतियों का व्यापार चलता था. यूरोप में भारत का जो माल जाता था, वह इटली के दो शहर, जिनोआ और वेनिस से जाता था. ये दोनों शहर भारतियों से व्यापार करने से मालामाल हो गए थे. ये लोग भारत का माल कस्तुनतुनिया (अर्थात आज का ‘इस्तांबुल’) से खरीदते थे. तब हम दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक देश थे.

सन १९०० के अंतर्राष्ट्रीय डॉलर्स के सन्दर्भ में यदि हम जी डी पी देखे तो –
• सन १००० में हमारी जीडीपी ३,३७५ करोड़ डॉलर्स थी, जब की दुनिया की जीडीपी ११,६७९ करोड़ डॉलर्स थी. अर्थात सन १००० में दुनिया की अर्थव्यवस्था में हमारी हिस्सेदारी २९% के करीब थी..!
• सन १५०० के आसपास हमारी जीडीपी ६,०५० करोड़ डॉलर्स हुई, तब दुनिया की जीडीपी थी – २४,७११ करोड़ डॉलर्स. अर्थात हमारा हिस्सा घटकर रह गया २४%. हालाँकि तब भी हम विश्व की पहले नंबर की अर्थव्यवस्था थे.
• सन १६०० के आसपास हम वैश्विक अर्थव्यवस्था का २२% वा हिस्सा बचे थे.

औरंगजेब के आने के बाद मुस्लिम धर्मान्धता और भी बढी और वैश्विक अर्थव्यवस्था में हमारा हिस्सा घटता चला गया. अंग्रेजों ने तो इसे पूरा ही चौपट कर दिया. उन्होंने भारतीय उद्योगों का और हम भारतियों की उद्यमशीलता का अत्यंत ठंडे दिमाग से खात्मा किया (cold blooded murder). सन १९१३ में, पहले विश्व युध्द के थोड़े पहले, पूरी दुनिया के बाजार में हमारा हिस्सा रह गया था, मात्र १.४ % !!

Indian Industry - 3

अंग्रेजों के आने से पहले हमारा निर्यात बहुत ज्यादा था, तो आयात अत्यंत कम. हमारा यह विशाल देश, पूर्णतः स्वयंपूर्ण था. अतः आयातित वस्तुओं की आवश्यकता अत्यंत कम थी. अर्थात हजारो वर्ष हम ‘ट्रेड सरप्लस’ रहे. अर्थात आयात कम, निर्यात ज्यादा. मुसलमानों ने जब हमारे देश पर आक्रमण किया, तब वह किसी एक देश का दुसरे देश पर आक्रमण नहीं था. मुसलमान आक्रान्ता तो कबाइली टोलियों के सरदार थे. उन्होंने भारत पर आक्रमण किया और यहाँ की रईसी देखकर उनकी आँखे चौंधियां गई, तो वे यही के हो गए. लेकिन अंग्रेजों का ऐसा नहीं था. भारत के व्यापार की कीमत पर उन्हें अपने उद्योग ठीक करने थे, चलाने थे. इसलिए अंग्रेजों के राज में, विशेषतः १८५७ के बाद हमारे स्थानिक उद्योग बंद होते गए. अर्थात निर्यात घटने लगा और स्वाभाविक प्रक्रिया में आयात बढ़ने लगा. हमारा ‘ट्रेड डेफिसिट’ भी बढ़ता गया.

अंग्रेज आने के पहले हमारे देश में उद्योग थे. अच्छे खासे थे. यहाँ लोहा उद्योग था, वस्त्र उद्योग था, मसालों का व्यापार था. हमारे यहाँ का कपड़ा उद्योग पूरे विश्व में प्रसिध्द था. दुनिया के हर एक कोने में, भारत में बने कपडे जाते थे. ढाके की मलमल का तो दुनिया में सानी नहीं था. मलमल का पूरा थान एक अंगूठी के बीच से निकल जाता था. यूरोप में इसकी बड़ी मांग थी और भारी कीमत देकर वे इस मलमल को खरीदते थे. सूरत, आगरा, वाराणसी, मुर्शिदाबाद, अहमदाबाद और दक्षिण के अनेक शहर वस्त्रोद्योग के लिए दुनिया में मशहूर थे. सूती, उनी, रेशमी आदि सभी प्रकार के वस्त्रों का निर्यात होता था.

Chemieanlage

कपड़ा उद्योग से लेकर तो सोने – चाँदी के व्यापार तक, सभी प्रकार के उद्योग थे. लेकिन यह सब विकेन्द्रित स्वरुप में था. अर्थात बड़े उद्योग नहीं थे. छोटे छोटे उद्योग, लेकिन पूरे देश में फैले थे. गांव की एक अर्थव्यवस्था थी, जिसमे आवश्यक सभी वस्तुएं या तो गांव में, या आस पास मिल जाती थी.

अंग्रेजों ने इसी व्यवस्था को तोड़ा. इस विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था से उनको कोई लाभ नहीं था. उन पर आश्रित रहने की हमारी आवश्यकता नहीं थी. इसलिए उद्योगों का और ‘स्वयंपूर्ण अर्थव्यवस्था का’ यह मॉडल अंग्रेजों ने ध्वस्त किया, समाप्त किया और उसके स्थान पर बड़े उद्योगों की अर्थव्यवस्था लेकर आए. यह व्यवस्था आयात आधारित थी. इससे भारत में प्रक्रिया उद्योग, उत्पादन आधारित उद्योग नष्ट हो चले. इसका असर हमारी अर्थव्यवस्था पर पडना ही था. कभी वैश्विक अर्थव्यवस्था के सिरमौर रहे हम, अंग्रेजों के राज में मात्र १.४ % की हिस्सेदारी पर सिमटकर रह गए.

पूरी दुनिया में इस समय क्रांतिकारी बदल हो रहे थे. उन्नीसवी शताब्दी औद्योगिक क्रांति को समर्पित रही. लेकिन भारत इससे अछूता ही रहा. क्योंकि अंग्रेज भारत को कृषि प्रधान देश ही बनाएं रखना चाहते थे. वे नहीं चाहते थे की भारत औद्योगिक केंद्र बने. भारत का कच्चा माल इंग्लैंड में जाता था और अंग्रेज उस पर प्रक्रिया कर के, उसे दुनिया को बेचते थे. ये उनके लिए बड़े ही फायदे का सौदा था. दुसरे विश्व युध्द के समाप्त होने तक भारतीय उद्योग लगभग ख़त्म हो चले थे. रंग करने के ब्रश से लेकर तो पहनने के शर्ट तक सब कुछ इंग्लैंड से ही आता था.
सन १९४७ में आजादी मिलने के बाद चित्र बदला. भारतीय उद्योग जगत एक बड़ी करवट लेने की परिस्थिति में आया. किन्तु प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु पर रशिया का अत्याधिक प्रभाव था. इसलिए पूर्णतः रशिया का कम्युनिस्ट मॉडल ना अपनाते हुए भी हमने समाजवादी मॉडल अपनाया. अर्थात प्रमुख सारे उद्योग सरकारी नियंत्रण में थे. दूरसंचार, हवाई यातायात, होटल आदि क्षेत्र भी पूर्णतः सरकारी नियंत्रण में थे. इसके भले – बुरे, दोनों परिणाम हुए. इस्पात की बड़ी बड़ी इकाइयाँ लगी, कोयला खदानों का और बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ आदि. लेकिन सन १९४७ से लेकर तो १९९१ तक, लगभग ४४ वर्ष भारतीय उद्योगों को पनपने का अवसर ही नहीं मिला.

कभी दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक देश, सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रहे हम, दुसरे देशों से तो छोडिये, अपने देश के अन्दर ही प्रतिस्पर्धा नहीं कर सके. प्रतिस्पर्धा के लिए कोई दूसरा था भी नहीं. इकलौती ‘इंडियन एयरलाइन्स’, इकलौता ‘दूरसंचार विभाग’ (तब तो बी एस एन एल भी नहीं था) ऐसी परिस्थिती थी. सरकार के स्वामित्व वाली कंपनियां ही अनेक क्षेत्रों में उत्पादन करती थी. बिरला, बजाज जैसे कुछ निजी उद्योगपति जरूर थे, लेकिन उनकी किसी से स्पर्धा ही नहीं थी. लाइसेंस राज था. बजाज की स्कूटर खरीदने के लिए नंबर लगाने पड़ते थे. और चार साल बाद स्कूटर मिलती थी. बीस – बीस वर्ष बजाज स्कूटर के मॉडल में स्क्रू भी नहीं बदलता था. देश की सारी उद्यमिता मानो ख़त्म हो रही थी.

सन १९५१ से १९७९ तक देश की आर्थिक विकास दर कभी भी ३.१ % के ऊपर नहीं गयी. तो पर कैपिटा विकास दर मात्र १.० % थी. आजादी के बाद के चवालीस साल लगभग हमने खो दिए थे..!!

ऐसे में एक बहुत बड़ा परिवर्तन आया सन १९९१ में. सारी दुनिया का चित्र बदल रहा था. जर्मनी एक हो गया था, तो रशिया का विघटन हो रहा था. साइबर युग का प्रारंभ होने जा रहा था. उदारिकरण के ये प्रारंभिक संकेत थे.
अपने भारत में भी परिस्थिति करवट ले रही थी. अल्पमत की सरकारे आ रही थी. देश में आंदोलनों का दौर चल रहा था, और देश की अर्थव्यवस्था पहली बार नीचांक पर पहुच गयी थी. विदेशी मुद्रा का भंडार समाप्ति की ओर था. उसे सम्मानजनक स्थिति पर पहुचाने के लिए पहली बार देश को सोना गिरवी रखना पडा.

१९९१ में सत्ता पर आए कांग्रेस के प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने मनमोहन सिंह को अर्थमंत्री नियुक्त किया और देश की आर्थिक नीति में एक बहुत बड़ा परिवर्तन प्रारंभ हुआ. मनमोहन सिंह और नरसिंह राव की जोड़ी ने अनेक आर्थिक सुधार लागू किये. खुली अर्थव्यवस्था की वकालत की. देश में प्रतिस्पर्धा का वातावरण निर्माण किया. अनेक उद्योगों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया. लेकिन साथ ही स्थानिक उद्योग स्वस्थ होकर काम करने से पहले ही उन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सामने प्रतिस्पर्धा करने छोड़ दिया.

भारतीय उद्योग विश्व में बड़े परिवर्तन की शुरुआत हो रही थी. आई टी उद्योग के ये प्रारंभ के दिन थे. एक बहुत बड़ा और नया आसमान आई टी के रूप में भारतीयों को दिख रहा था. प्रतिभाशाली भारतीय इसमें कूद पड़े और आई टी के क्षेत्र में इतिहास बनता चला गया.

उदारीकरण की नीति के कारण टेलिकॉम, वाहन निर्माण, भवन निर्माण आदि उद्योगों ने भी जोर पकड़ा और निजी क्षेत्र के उद्यमी इसमें पैठ बनाने लगे.

लेकिन दुर्भाग्य से उद्योग जगत के इस विस्तार को सरकारी स्तर पर कोई दिशा नहीं थी. यह एक अवसर था भारत को ‘उत्पादन केंद्र’ (Manufacturing Hub) बनाने का. लेकिन हुआ ठीक उल्टा. सेवा क्षेत्र पर जोर दिया गया और रहे सहे उत्पादन आधारित उद्योग भी बंद होने लगे. इलेक्ट्रोनिकी सामानों का उत्पादन पहले भारत में होता था. लेकिन १९९५ के बाद से धीरे धीरे बंद होता गया. सेवा क्षेत्र बढ़ रहा था. आई टी क्षेत्र में भी बढ़ोतरी थी.

भारतीय युवक / युवतियों की प्रतिभा देखकर दुनिया की अनेक नामी – गिरामी आई टी कंपनियां भारत में अपने ‘विकसन केंद्र’ (Development Centre) खोल रहे थे. स्वाभाविकतः निर्यात में सॉफ्टवेयर की हिस्सेदारी बढ़ रही थी. टी सी एस, इन्फोसिस, विप्रो आदि कंपनियों के विस्तार के यही दिन थे. बीसवी सदी की समाप्ति पर Y2K नामक नई समस्या निर्माण हुई थी, जिसका भारतीय आई टी कंपनियों ने भरपूर दोहन किया.

लेकिन आई टी उद्योग इतना बढ़ने के बाद भी, और इस के माध्यम से पूरी दुनिया में भारत की अपनी पहचान बनने के बाद भी, दिशाहीन ही रहा. पूरा जोर सेवा क्षेत्र में देने से आई टी और ‘आई टी इनेबल्ड’ सर्विसेज का ख़ासा महत्व रहा. अमरीका समवेत अनेक देशों ने अपने कॉल सेंटर्स भारत में खोले. बी पी ओ उद्योग चरम पर पहुचने लगा. इन सब में आई टी के उत्पादनों (products) की ओर कंपनियों का ध्यान नहीं गया, या उन्होंने ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा. हमारे आई टी के व्यवसायी अभियंता मात्र पढ़े लिखे मजदूर बनकर रह गए. टी सी एस, इनफ़ोसिस, विप्रो जैसी बड़ी कंपनियों ने भी आई टी उत्पादनों पर जोर नहीं दिया. उनकी प्राथमिकता तो विदेशी कंपनियों के लिए आवश्यकतानुसार सॉफ्टवेयर बना देने तक सिमित रही. इसलिए भारत में प्रतिभा होने के बाद भी माइक्रोसॉफ्ट, ओरेकल, गूगल जैसी कंपनियों का निर्माण नहीं हो पाया..!

Indian Industry -1

ये ऐसा समय था, जब आई टी इंडस्ट्री में लगने वाला सारा हार्डवेयर हमें आयात करना पड़ता था. सन २००३ में जब आई टी के तत्कालीन मंत्री प्रमोद महाजन ने घोषणा की कि ‘सन २००८ तक हमारा देश पचास बिलियन अमेरिकन डॉलर्स का सोफ्टवेयर निर्यात करेगा’, तो चेन्नई आई आई टी में कंप्यूटर विभाग के प्रमुख, प्रोफे. अशोक झुनझुनवाला को यह कहना पडा था – “To export 50 billion US Dollars software, whether we have to import 50 billion US Dollars hardware..?”

अर्थात हम आगे तो बढ़ रहे थे, लेकिन उद्योग जगत को लेकर कोई स्पष्ट नीति सरकारी स्तर पर दिखती नहीं थी. चाहे विमानन क्षेत्र हो या वाहन निर्माण उद्योग, टेलिकॉम की फ्रीक्वेंसी के लाइसेंस बांटने हो या कोयले के भंडारों का आबटन करना हो…. सभी क्षेत्रों में स्पष्टता का अभाव था. और इस अभाव के कारण ही भ्रष्टाचार चरम पर था.

इतना सब होते हुए भी पिछले कुछ वर्षों में हमारा विकास दर अच्छा था. इसका कारण था, भारत में आधारभूत संरचना (infrastructure) की अनेक परियोजनाएं चल रही थी. मेट्रो से लेकर तो जे एन यु आर एम् की अनेक योजनाओं तक..! इन सबके कारण अर्थव्यवस्था को तो थोड़ी बहुत गति मिल रही थी लेकिन विकास की अनंत संभावनाएं होते हुए भी हम उसी तक सिमटे थे.

परिस्थिति में परिवर्तन आया मई, २०१४ में मोदी सरकार के आने पर. इस सरकार ने धीरे धीरे सभी क्षेत्रों में स्पष्ट नीति लागू करने की शुरुआत की हैं. कोयले का बड़ा भण्डार बिना किसी भ्रष्टाचार के आंबटित हो गया. 4G की फ्रीक्वेंसी के बटवारे में भी कोई विवाद सामने नहीं आया और 4G का रास्ता साफ़ हो गया.

इस सरकार ने जो सबसे बड़ा कदम उठाया हैं, वह हैं – ‘मेक इन इंडिया’. इसके परिणाम आने में दो – तीन साल लगेंगे. लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा और सकारात्मक असर पड़ना निश्चित हैं. बेरोजगारी दूर करने में भी यह अभियान बड़ी मदद करेगा.

आज ‘परचेसिंग पॉवर पैरिटी’ की दृष्टि से देखा तो भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया में तीसरे स्थान पर हैं. और जीडीपी की दृष्टि से हम दुनिया में सातवे स्थान पर हैं.

हमारी दुखती रग हैं, हमारा आयात. पिछले वर्ष हमने ६१० बिलियन अमरीकी डॉलर्स का सामान आयात किया, जिसमे सबसे ज्यादा हिस्सेदारी, अर्थात १२.७ %, चीन की थी. यह हमारे तेल और गैस के आयात के लगभग बराबर हैं.

इसकी तुलना में हमारा निर्यात हैं, मात्र ४७७ बिलियन अमरीकी डॉलर्स..! इसका मतलब हैं, पिछले वर्ष हमारा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार घाटा था – १३३ बिलियन अमरीकी डॉलर्स..!

आज हमारी विदेशी मुद्रा का भंडार ३५० बिलियन अमरीकी डॉलर्स हैं, जो चीन के विदेशी मुद्रा भण्डार का लगभग एक दहाई हैं. और इसीलिए ‘मेक इन इंडिया’ का महत्व सामने आता हैं. इस अभियान से अगले दो – तीन वर्षों में हमारा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार घाटा तो कम होगा ही, साथ ही साथ विदेशी मुद्रा भण्डार भी बढेगा.

उद्योग जगत की जबरदस्त संभावनाओं के बीच हम आगे बढ़ रहे हैं. इस समय हमारे उद्योग क्षेत्र को स्पष्ट दिशा हैं और सरकारी नीति भी साफ़ हैं. बस आवश्यकता हैं, उद्योग व्यावसायिकों ने प्रमाणिकता के साथ बुलंदियों को छूने की..!

अगर ऐसा होता हैं, तो वह दिन दूर नहीं, जब हम पुनः विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभर सकते हैं..!

– प्रशांत पोल
ई-मेल : telemat@bsnl.in

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Author: प्रशांत पोळ

I am an Engineer by profession. Consultant in Telecom and IT. Interested in Indology, Arts, Literature, Politics and many more. Nationalistic views. Hindutva is my core ideology.

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